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INSIGHTS

राजनीतिक रणनीति पर विश्लेषण

उत्तर प्रदेश की राजनीति, चुनावी रणनीति और नैरेटिव निर्माण को समझने वाले संक्षिप्त, तथ्य-आधारित लेख।

आपके आसपास लोग सच बोलते हैं, या सिर्फ़ वही बताते हैं जो आप सुनना चाहते हैं
हर नेता के पास सूचना का एक घेरा होता है। सवाल यह है कि वह घेरा सच दिखाता है या सिर्फ़ वह तस्वीर जो देखने में अच्छी लगती है।
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बूथ स्तर पर चुनावी कमज़ोरी कैसे पहचानी जाती है
चुनाव परिणाम विधानसभा स्तर पर दिखते हैं, पर असली कहानी बूथ स्तर पर लिखी जाती है। कमज़ोरी पहचानने के लिए किन बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है, यह समझना हर अभियान की पहली सीढ़ी है।
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नैरेटिव बिल्डिंग और प्रचार में अंतर
प्रचार शोर है, नैरेटिव दिशा है। दोनों में क्या फ़र्क़ है, और चुनावी अभियान में यह फ़र्क़ क्यों निर्णायक साबित होता है।
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आपके आसपास लोग सच बोलते हैं, या सिर्फ़ वही बताते हैं जो आप सुनना चाहते हैं

हर नेता, हर उम्मीदवार के पास लोगों का एक घेरा होता है। कार्यकर्ता, सहयोगी, शुभचिंतक। यह घेरा उपयोगी भी होता है और खतरनाक भी। उपयोगी इसलिए क्योंकि यह जुड़ाव और भरोसा दिखाता है। खतरनाक इसलिए क्योंकि अक्सर यही घेरा असली तस्वीर को छुपा देता है।

जो लोग रोज़ आपके आसपास रहते हैं, वे अक्सर वही बात कहते हैं जो आपको खुश रखे। यह उनकी गलती नहीं है, यह मानव स्वभाव है। कोई भी अपने नेता को निराश नहीं करना चाहता। पर इसी वजह से बहुत से फैसले ज़मीनी सच्चाई से दूर, एक आरामदायक भ्रम के आधार पर लिए जाते हैं।

पॉलिटिकल इंटेलिजेंस असल में क्या करती है

पॉलिटिकल इंटेलिजेंस का काम है इस घेरे के बाहर जाकर देखना। यह जानना कि आम मतदाता, जो आपसे सीधे कभी नहीं मिलता, वह असल में क्या सोचता है। किस मुद्दे पर नाराज़गी है, किस वादे पर भरोसा टूटा है, कहां चुप्पी है जो बोलने से भी ज़्यादा कुछ कहती है।

यह काम अंदाज़े से नहीं होता। यह ज़मीनी बातचीत, बूथ स्तर के रुझान, स्थानीय मुद्दों की समझ और लगातार सुनने की आदत से बनता है। इसमें जल्दबाज़ी की गुंजाइश नहीं होती, क्योंकि जनभावना धीरे बदलती है, पर एक बार बदल जाए तो उसे मोड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है।

यह क्यों मायने रखता है

राजनीति में सबसे महंगी गलती वह होती है जो देर से पकड़ में आती है। जो नेता अपने आसपास के भरोसे को ही पूरा सच मान लेता है, वह अक्सर तब तक कुछ नहीं करता जब तक स्थिति संभालने लायक नहीं रह जाती। ज़मीनी समझ जितनी जल्दी मिले, फैसले उतने ही समय पर लिए जा सकते हैं।

अभिषेक श्रीवास्तव
Founder, BINEX INDIA
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बूथ स्तर पर चुनावी कमज़ोरी कैसे पहचानी जाती है

विधानसभा का चुनाव परिणाम एक औसत होता है। यह यह नहीं बताता कि जीत या हार असल में किन बूथों से आई। किसी भी गंभीर चुनावी रणनीति की शुरुआत विधानसभा को उसके छोटे छोटे बूथों में तोड़कर देखने से होती है।

बूथ स्तरीय विश्लेषण में क्या देखा जाता है

सबसे पहले मतदान प्रतिशत का अंतर देखा जाता है। किन बूथों पर मतदान औसत से काफी कम या ज़्यादा रहा, और इसकी वजह क्या हो सकती है। फिर देखा जाता है ऐतिहासिक रुझान। कौन से बूथ पिछले दो तीन चुनावों में लगातार एक ही तरफ झुके रहे, और कौन से बदलते रहे।

इसके बाद आती है सामाजिक बनावट। किसी बूथ के मतदाताओं की जातीय और सामाजिक संरचना परिणाम को किस तरह प्रभावित करती है। और अंत में संगठनात्मक उपस्थिति। किन बूथों पर कार्यकर्ता नेटवर्क कमज़ोर है, जहां मतदाता से सीधा संपर्क नहीं हो पाता।

इस विश्लेषण का मकसद किसी को दोष देना नहीं है। मकसद यह समझना है कि सीमित समय और संसाधन में ध्यान कहां लगाया जाए तो सबसे ज़्यादा फर्क पड़े। एक विधानसभा में आमतौर पर कुछ गिने चुने बूथ ही चुनाव का नतीजा तय करते हैं। बाकी जगह रुझान पहले से साफ रहता है।

अक्सर होने वाली गलती

बहुत से अभियान पूरी विधानसभा में संसाधन बराबर बांट देते हैं। यही सबसे बड़ी चूक होती है। सीमित संसाधनों को उन बूथों पर लगाना जहां मार्जिन सबसे पतला है या बदलाव की संभावना सबसे ज़्यादा है, यही असली रणनीति है।

अभिषेक श्रीवास्तव
Founder, BINEX INDIA
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नैरेटिव बिल्डिंग और प्रचार में अंतर

प्रचार और नैरेटिव को अक्सर एक ही समझ लिया जाता है, जबकि यह दो अलग चीज़ें हैं। यह फर्क समझना किसी भी गंभीर राजनीतिक संचार रणनीति की नींव है।

प्रचार क्या है

प्रचार मात्रा पर टिका होता है। पोस्टर, रैलियां, बैनर, सोशल मीडिया पोस्ट। यह बताता है कि मैं यहां हूं, मैंने यह किया, मेरी उपलब्धि यह रही। प्रचार शोर पैदा करता है। यह ज़रूरी तो है, पर अकेले पर्याप्त नहीं।

नैरेटिव क्या है

नैरेटिव एक सुसंगत कहानी है जो बताती है कि मैं यह क्यों कर रहा हूं, यह जनता के लिए क्यों मायने रखता है, और मेरा प्रतिद्वंदी इसका जवाब क्यों नहीं दे सकता। नैरेटिव दिशा तय करता है। यह बिखरे हुए प्रचार को एक कहानी में पिरो देता है।

यह फर्क क्यों मायने रखता है

बिना नैरेटिव के प्रचार जल्दी भुला दिया जाता है। कोई पोस्टर याद नहीं रहता, कहानी याद रहती है। नैरेटिव संकट के समय सुरक्षा कवच का भी काम करता है, क्योंकि जब आरोप लगते हैं तो एक स्पष्ट नैरेटिव जवाब देना आसान बना देता है। मीडिया और जनता दोनों कहानी खोजते हैं, सिर्फ जानकारी नहीं। जिसके पास बेहतर कहानी होती है, उसकी बात ज़्यादा दूर तक जाती है।

व्यावहारिक रूप से किसी भी अभियान की शुरुआत नैरेटिव तय करने से होनी चाहिए। प्रचार की योजना उसके बाद बननी चाहिए, न कि इसके उलट।

अभिषेक श्रीवास्तव
Founder, BINEX INDIA